Hafiz Shirazi

Aashiq-e-Yaram Mara Ba-Kufr-O-Ba-Iman Che Kar

ashiq-e-yaram mara ba-kufr-o-ba-iman che kaar

tishna-e-dardam mara ba-vasl-o-ba-hijran che kaar

मैं तो यार का आशिक़ हूँ मुझे कुफ़्र और ईमाँ से क्या काम

मैं दर्द का प्यासा हूँ मुझे वस्ल और हिज्र से क्या काम

kushta-e-ishqam mara az shahna-e-dauran che gham

muflis-e-auram mara ba zumra-e-divan che kaar

मैं इश्क़ का मक़्तूल हूँ मुझे ज़माने के कोतवाल का क्या ग़म

मैं नंगा मुफ्लिस हूँ मेरा दफ़्तर वालों से क्या काम

qibla-o-mehrab-e-man abru-e-dil-dar ast-o-bas

iin dil-e-shorida ra ba-in-che-o-ba-an-che kaar

मेरा क़िब्लः और मेहराब बस दिलदार की अब्रू है

इस दीवानः-दिल को इस और उस से क्या काम

surat-e-mardan che khvahi sirat-e-mardan gazin

mard-e-ashiq-pesha ra ba surat-e-aivan che kaar

तू मर्दों की सूरत क्या चाहता है मर्दों की आदत अख़्तिया कर

आशिक़-पेशः इंसान को महल की तसवीर से क्या काम

chuun ki andar har-do-alam yaar mi-bayad mara

ba-behisht-o-ba-dozakh-o-ba-hur-o-ba-ghulman che kaar

चुँकि दोनों जहाँनों में मुझे यार चाहिए

बहिश्त और दोज़ख़ और हूर और ग़िल्माँ से क्या काम

har ki az khud shud mujarrad dar tariq-e-ashiqi

az gham-o-dardash che agahi-o-ba-darman che kaar

जो इश्क़ के रास्तः में अपने वजूद ही से जुदा हो गया

उसको दर्द और ग़म से क्या वाक़फ़िय्यत और इलाज से क्या काम

‘hafiza’ gar ashiq-o-masti digar rah baaz go

ashiqa-e-yaram mara ba-kufr-o-ba-iman che kaar

ऐ ‘हाफ़िज़’ अगर तू आशिक़ और मस्त है दोबारः कह

मैं यार का आशिक़ हूँ तुझे कुफ़्र और ईमाँ से क्या काम

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